अलवर के महाराव राजा बख्तावरसिंह व्यक्तित्व और कृतित्व के विशेष संदर्भ में
प्रस्तावना :- आमेर के कच्छवाहा वंश के बारे मे हम सभी
जानते है इसी आमेर वंश की एक शाखा ने अलवर राज्य की स्थापना की | आरंभ मे
ये आमेर शासकों के अधीन थे | लेकिन बाद मे स्वतंत्र हो गए इसी वंश मे बख्तावरसिंह
शासक हुआ जिसके काल मे अलवर राज्य का अत्यधिक विकाश हुआ |
महाराव
राजा बख्तावरसिंह के बारे मे अत्यधिक
जानकारी का अभाव है | इनके बारे मे अधिक जानेने के लिए इनके ऊपर शोध कार्य की
आवश्यकता है | महाराव राजा बख्तावरसिंह के बारे मे मै अपना शोध प्रस्ताव प्रस्तुत कर रहा हूँ |
अलवर की सामान्य जानकारी
:- 18 वीं सदी मे
राजस्थान मे पश्चिमोत्तरीय भाग मे सूर्य वंशी क्षत्रियों की नरूका शाखा अलवर राज्य
पर शासन था | इस राज्य के उत्तर
मे पंजाब प्रांत का गूडगाव था जो वर्तमान मे हरियाणा मे आता है | नाभा राज्य की
बावल और जयपुर राज्य की कोट्कासिम परगना था | इस राज्य के
पूर्व मे भरतपुर राज्य और दक्षिण मे जयपुर राज्य था |
भोगोलिक द्रष्टि से यह राज्य निम्न भागों
मे विभक्त था :-
1 नरुका खंड :- यहाँ नरुका शाखा का शासन था जिसके
कारण इसका नाम नरुखण्ड पड़ा |
2 राजावाटी:- अलवर का दक्षिणी-पश्चिमी भाग राजावाटी कहलाता था | यहाँ कछवाहों की राजावत शाखा थी |
3 बाला क्षेत्र :- पश्चिमी सीमा से साबी नदी तक
4 राठ :- चौहानों द्वारा स्थापित क्षेत्र
5 मेवात :- मुख्यत: मेव लोग रहते थे
6 काठेडी :- कठुम्बर परगने का भाग
7 नेहड़ा :- थानागाजी के पार्श्व भाग को
नेहड़ा कहा गया
अलवर राज्य की स्थापना :- अलवर पर जयपुर के कछवाहा राजवंश का शासन था | आमेर के राजा सवाई जयसिंह ने नरुका शाखा के
कल्याणसिंह को मचेड़ी की जागीर दी | आगे चलकर इसी के वंशज प्रतापसिंह नरुका हुआ जिसके मुगल बादशाह शाहआलम द्वितीय
के साथ अच्छे संबंध थे | इसने 1774 ई ॰ को स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर दिया |
1775 ई ॰ मे
इसने अलवर पर अधिकार कर लिया और इसे अपनी राजधानी बनया | इस प्रकार प्रताप सिंह के अदम्य साहस और अक्लांत
पौरुष से अलवर राज्य की स्थापना हुई |
प्रतापसिंह के कोई संतान नहीं थी इसलिए
उसने बख्तावरसिंह को गोद ले लिया और अपने जीवनकाल मे ही उसे अपना उत्तराधिकारी
घोषित कर दिया |
1791 ई ॰ मे महाराव राजा प्रतापसिंह की
मृत्यु हो गयी
बख्तावरसिंह का आरंभिक जीवन :-
बख्तावरसिंह का जन्म
20 नवंबर 1776 ई ॰ को थाने नामक ठिकाने मे हुआ था | इनके पिता धीरसिंह थाने ठिकाने के ठिकानेदार थे | महाराव राजा प्रतापसिंह ने इसकी
प्रतिभा से प्रसन्न होकर इसे गोद ले लिया | प्रतापसिंह की मृत्यु के बाद सरदारों ने इसे शासक
बना दिया | इस समय इनकी
आयु 15 वर्ष थी |
बख्तावरसिंह ने
प्रताप के दीवान को अपना प्रधानमंत्री नियुक्त किया तथा राज्य प्रबंधन का भार
उसे सौंप दिया |
बख्तावरसिंह की समस्याए:-
1 पहली समस्या इसका दीवान रामसेवक था जो
स्वयं शासक बनाना चाहता था | वह मराठों से जाकर मिल गया तथा उसने राजगढ़ पर डेरा डलवा दिया | वह इतने पर ही संतुष्ट नहीं हुआ
उसने बख्तावरसिंह और राजमाता महारानी गौड़ के बीच मनोमालिन्य उतपन्न कर दिया था |
बख्तावरसिंह को जब इस षडयंत्र का पता
चला तब उसने दीवान को उचित दंड देने का निश्चय किया | उसने दीवान को कहलवा भेजा की राज्य
प्रबंधन संबंधी कुछ विचारणीय मामलों मे तुम्हारी संपत्ति अपेक्षित है इसके
अतिरिक्त इस समय कुछ एसे कार्य मेरे सामने
उपस्थित किए गए हैं की जिनका यथोचित सम्पादन के लीए तुम्हारा योगदान आवश्यक है |
यद्यपि दीवान
रामसेवक पहले ही समझ चुका था कि बख्तावरसिंह उसे दंड देना चाहता है| लेकिन फिर भी राजाज्ञा कि अवहेलना
करने का उसका साहस नही हुआ | अत: विवश होकर वह बख्तावरसिंह के सामने उपस्थित हो गया | बख्तावरसिंह ने उसे मृत्युदंड दिया
और मराठों से राजगढ़ को मुक्त करवा दिया |
2॰
18 जनवरी 1792 ई ॰ को जयपुर महाराव राजा ने दौसा मे तुकोजी होल्कर से बातचीत कि | इस समय जयपुर महाराव राजा और होल्कर के बीच समझोता हो गया जयपुर महाराव
राजा ने होल्कर लो सहायता देने के लिये
कहा तथा उससे वादा किया कि बख्तावरसिंह के जीतने भी इलाकों पर वह अधिकार करेगा
उसमे से आधा भाग उसे दे देगा | जयपुर महाराव राजा के प्रलोभन मे आकर
होल्कर ने बापुराव होल्कर के नेत्रत्व मे मराठा सेना जयपुर कि सहायता के लीए भेजी | इस सेना को अलवर राज्य के अनेक
क्षेत्र छीनने मे सफलता मिली |
बख्तावरसिंह ने 1793 ई ॰ मे
मारवाड़ जाकर कूचामन के ठाकुर सूर्यमान कि पुत्री से विवाह किया | कसली का जगीरदार बख्तावरसिंह के
कूचामन ठाकुर कि पुत्री के साथ विवाह से नाराज था | उसके सीकर के राव के अच्छे संबंध नहीं थे | कसली का जागीरदार स्वभाव से उद्दंड
और उग्र था उसकी उद्दंडता से सिकर वाले बहुत परेशान थे | विवाह से लौटते समय बख्तावरसिंह ने कसली पर अधिकार
कर लिया तथा उसे लक्ष्मणसिंह कों दे दिया |
कसली
पर अधिकार के बाद जब बख्तावरसिंह ने जयपुर कि ओर प्रस्थान किया तब जयपुर महाराव
राजा सवाई प्रताप सिंह ने उसका बड़ा आदर
सत्कार किया और महाराव राजा प्रताप सिंह कि मृत्यु पर शोक प्रकट किया | इसके बाद जयपुर महाराव राजा ने बख्तावरसिंह को बंदी बना लिया और गुढा , सेथल, बावड़ी खेड़ा, दुब्बी, सिकराय आदि
परगने जयपुर महाराव राजा को देने पर ही
उसको मुक्त किया गया |
शेखों का दमन :-
प्रतापसिंह के समय अलवर राज्य का
प्रबंधन नबी बख्श खाँ और होशदार खाँ आदि
शेखों के हाथ मे था जो राज्य के प्रभावशाली और शक्तिशाली अधिकारी थे | बख्तावरसिंह के समय मे इनका
प्रभुत्व ज्यों का त्यों रहा जिसका परिणाम यह हुआ कि शेख उसके आदेशों कि अवहेलना
करने लगे | इनकी यह
निरंकुशता और स्वेच्छाचरिता बख्तावरसिंह कों बहुत खटकती थी परंतु कुछ समय तक
उन्होंने इनके दुर्व्यवहार पर कोई ध्यान नहीं दिया |
किन्तु एक दिन शेख
इलाहि बख्श कि गर्वोक्ति पूर्ण बात सुनकर बख्तावरसिंह नाराज हुआ और उसने शेखों के
प्रभाव कों खत्म करने का निश्चय किया | उसने धीरे-धीरे राज्य प्रबंधन अपने हाथों मे ले लिया और राज्य के सभी
कर्मचिरियों को भी अपनी मुट्ठी मे कर लिया तब उसने अलवर मे मौजूद शेखों के प्रभाव
को समाप्त कर दिया |
शेख इलाही बख्श इस समय अलवर मे
नहीं था वह अलवर राज्य कि तरफ से वकील नियुक्त होकर अंग्रेजों के साथ रहता था | जब उसने अपने भाइयों कि मृत्यु का
समाचार सुना तो वह हाथ मलकर रहा गया | इस घटना से उसके ह्रदय पर एसी चोट लगी कि वह भी बहुत समय तक जीवित नहीं बचा |
बख्तावरसिंह कि गतिविधियां :-
बख्तावरसिंह ने भरतपुर
नरेश से अपने पूर्वज कल्याणसिंह कि जागीर के गाँव कामा, खोहरी , पहाड़ी , नगर , और गोपालगढ़ आदि छीन लीए और बावल
घाटी , फिरोजपुर , तथा कोटपुतली पर अधिकार कर लिया | भरतपुर के सीमाप्रान्त कि कुछ भूमि
खानजादों के अधिकार मे थी जुल्फ़ीकार खान उसका मुखिया था और धौसवाली दुर्ग भी उसके
अधिकार मे था |
1800 ई ॰ मे
बख्तावरसिंह और जुल्फ़ीकार खान के बीच मुटभेड़ हुई जिसमे बख्तावरसिंह मे मराठों कि
सहायता से जुल्फ़ीकार खान को मर भगाया और उसका दुर्ग नष्ट कर उसके समीप गोविंदगढ़ का
निर्माण करवाया |
अंग्रेजों कि सहायता :-
आरंभ मे मराठा और बख्तावरसिंह के
संबंध अच्छे थे लेकिन मराठों ने सेनापति अंबाजी इगले के नेत्रत्व मे कठुम्बर परगने
पर आक्रमण किया बख्तावरसिंह व इगले कि सेना के बीच मुठभेड़ हुई थी |
मराठा सेना ने इस क्षेत्र मे एक ब्राहमन को मार दिया था | पिता के वध से दुखी होकर उक्त
ब्राह्मण बख्तावरसिंह कि सभा मे उपस्थित होकर अपने दुख के संबंध मे प्रार्थना कि
उसकी प्रार्थना को स्वीकार करते हुए उन्होने उसी क्षण भगवनदास टागड़ा नमक अपने एक
सेनापति को भेजा |
भगवानदास ने कठुम्बर पर चढ़ाई कर के सारे दुर्ग रक्षकों को युद्ध मे मार
डाला और अपने पाँच सौ योद्धाओं को दुर्ग कि रक्षार्थ छोडकर स्वयं अलवर लौट आया | जब यह समाचार सिंधिया को ज्ञात हुआ
तो वह बहुत अधिक क्रोधित हुआ और उसने कठुम्बर के दुर्ग को फिर से अधिकार मे करने
के लीए एक बड़ी सेना भेजी |
बख्तावरसिंह इस समय
मराठों के विरुद्ध अंग्रेज़ जनरल लेक के पास सहायता के लीए गया | जनरल लेक ने अपनी सेना लेकर मराठों
का पीछा करते हुए कठुम्बर तक आ पहुंचा और उसने मराठों को वहाँ से मर भगाया |
लसवाड़ी का युद्ध
( नवंबर 1803 ई॰ ):-
मराठी सेना ने
कठुम्बर मे पराजित होने के बाद रूपारेल नदी के किनारे लसवाड़ी नामक स्थान पर शरण ली |
दूसरे दिन जब लेक को यह पता चला तो वह
फ़तहपुर मे अपनी बड़ी तोप और सैनिक सामग्री छोड़कर मराठों का सामना करने के लीए तुरंत
रवाना हुआ तथा 31 ओक्टोबर को उसके पास पहुँच गया |
बख्तावरसिंह ने अंग्रेजों कि सहायता की | मराठा सेना सिंधिया के नेत्रत्व मे वीरता से लड़ी
लेकिन अंग्रेज़ व अलवर कि संयुक्त सेना के सामने मराठा सेना बहुत समय तक नहीं टिक
सकी | इस युद्ध मे
अलवर नरेश बख्तावरसिंह के द्वारा महत्वपूर्ण सहायता देने के बदले मे अंग्रेजों ने
बख्तावरसिंह को 13 परगने प्रदान किए |
19 दिसंबर 1803
ई॰ को अंग्रेजों और बख्तावरसिंह के मध्य संधि हो गयी |
तिजारा मे
विद्रोह (1805 ई॰):-
1805 ई॰ मे तिजारा निवासियों ने बख्तावरसिंह के विरुद्ध
विद्रोह कर दिया | वहाँ शांति स्थापित कने के लीए नवाब अहमद खान बक्स के भाई नबी खान और दीवान
बालमुकुंद को भेजा गया | तिजारा पहुँचते ही दीवान बालमुकुन्द प्रलोभन मे आकर विद्रोहियों से मिल गया | इसका समाचार जब बख्तावरसिंह को
मिला तो उसने बालमुकुंद को तुरंत पद से हटा दिया और उसके स्थान पर भगवानदास टांकड़ा
को भेजा | कुछ दिन बाद भगवानदास को भी पद से हटा दिया गया |
दीवान रामलाल ने तिजारा मे शांति
स्थापित कि और रामगढ़ी का निर्माण करवाया और रूपवास पर चढ़ाई कर उसे लूट लिया | इसके बाद वह शाहबाद पहुंचा और नवाब
फेज्जुल्लाह खान को अधीनता स्वीकार करने के लीए विवश किया |
1811 ई॰ मे
तिजारा के मेवों ने फिर विद्रोह कर दिया तब अंग्रेज़ जनरल सेना सहित तिजारा पहुँचा
और वहाँ मेवों के विद्रोह का दमन किया |
साहित्यिक समीक्षा
:-
बख्तावरसिंह के संबंध मे सेपरेट
पुस्तकों का अभाव है लेकिन इनका वर्णन निम्न पुस्तकों मे मिलता है
1 मायाराम ने राजस्थान डिस्ट्रिक्ट गजेटियर अलवर के प्र॰सं 63 पर यह लिखा मिलता
है कि बख्तावरसिंह 12 वर्ष कि आयु मे राजगद्दी पर बेठा | यह कथन सही प्रतीत नहीं होता क्योंकि बख्तावरसिंह का
जन्म 1776 ई को हुआ था |
2 सुखवीर सिंह गहलोत कि पुस्तक राजस्थान के इतिहास तिथिक्रम मे बख्तावरसिंह के
बारे मिलती है इसमे जयपुर और मराठों के बीच बख्तावरसिंह के क्षेत्रों को लेकर जो
संधि हुई थी उसका उल्लेख मिलता है |
3 श्यामलदास कि वीर विनोद भाग 4 मे बख्तावर सिंह के द्वारा गोविंगढ़ के निर्माण
का उल्लेख मिलता है |
4 सरकार जे एन कि पुस्तक मुगल साम्राज्य का पतन भाग 4 मे उल्लेख है कि अम्बाजी
इंगले ने मचेड़ी मे लूटमार प्रारम्भ कर दी जिसके कारण बख्तावरसिंह को अंग्रेजों कि
शरण लेनी पड़ी |
5 डा॰ रामप्रसाद व्यास की पुस्तक आधुनिक
राजस्थान का व्रहत इतिहास मे उल्लेख है की प्रतापसिंह नरुका प्रारम्भ मे जयपुर
राज्य का एक छोटा सा जगीरदार था । जिसने आगे चलकर अलवर राज्य की स्थापना की तथा
इसका उत्तराधिकारी बख्तावर सिंह हुआ ।
शोध प्रविधि :-
प्रस्तुत शोध मे प्राथमिक शोध विधि जैसे प्रश्नावली विधि , अनुसूची विधि , तथा वर्णात्मक विधि का प्रयोग किया जाएगा | शोध मे द्वितीयक श्रोत के अंतर्गत
पुस्तकें , इंटरनेट , समाचार पत्र , जर्नल तथा विभिन्न प्रकाशित
आर्टिकल का प्रयोग किया जाएगा |
प्रस्तुत शोध मे शोधार्थी
द्वारा इस बात को जानने का प्रयाश किया जाएगा की किस प्रकार से महाराव राजा
बख्तावरसिंह ने अलवर राज्य के विकाश और सांस्कृतिक विकाश मे भूमिका निभाई | इस हेतु उन सभी व्यक्तियों से
व्यक्तिगत रूप से एक प्रश्नावली के द्वारा
उनके भावों और धारणाओं को जानने की कोशिश की जाएगी तत्पश्चात शोधार्थी द्वारा
विभिन्न सूत्रों जैसे सहसंबंध और प्रतिक्रमण विधियों से यह जानने की कोशिश की
जाएगी |
संधर्भ सूची :-
1) प्राथमिक श्रोत :-
i. Cataough Govt. Museum, Alwar
ii. Catalough Govt. Museum, Amber
iii. Catalough Govt. Museum, Bhartpur
iv. Catalough Govt. Museum, Bikaner
2) द्वितीयक श्रोत :-
I.
डॉ॰ एस॰एल॰ नागोरी, अलवर राज्य का इतिहास, चिन्मय प्रकाशन
II.
डॉ॰ रामप्रशाद व्यास , आधुनिक राजस्थान का वृहत इतिहास , राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी
III.
शोध गंगा , इंटरनेट वैबसाइट
IV.
जाचक जीवण , प्रताप रासो
V.
श्यामलदास , वीर विनोद
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